न कभी ये जान सके दूरियां क्यों थी, जुबान पर थे लफ़्ज फिर वो मजबूरियां क्यों थी, दिलों की बातें अगर हकीकत होती हैं, हमारे दरमियाँ वो खामोशियाँ न होती, बुने थे हमने भी कुछ रेशमी धागों से ख्वाब, मगर हमारे हाथों में वो काली डोरियां क्यों थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *